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Stream/Area:
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Subject:
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Paper ID:
IJSREM63621
Volume:
10 |
5 |
May 2026
Pages:
1-5
Publication Frequency:
Monthly (12 issues per year)
License:International Journal of Scientific Research in Engineering and Management follows the Creative Commons Attribution 4.0 (CC BY 4.0) License, allowing free use and distribution with proper attribution.

political science
Kumaun University, Nainital Uttarakhand

political science
Govt Degree college danya, almora(Uttarakhand )
उत्तराखंड राज्य का गठन 9 नवंबर 2000 को हुआ था। यह राज्य एक स्वतः निर्मित जन आंदोलन का परिणाम है। उत्तर प्रदेश में रहते हुए इस राज्य के पर्वतीय भाग के लोगों ने हमेशा अपने आप को उपेक्षित महसूस किया और सरकारी नीतियों व योजनाओं में उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र को हमेशा ठगा हुआ महसूस किया। इसे दूर करने के लिए यहाँ के जनमानस ने एक आंदोलन को जन्म दिया, जिसे आंदोलनों के इतिहास में उत्तराखंड राज्य आंदोलन के नाम से जाना जाता है। उत्तराखंड राज्य आंदोलन की अवधि 1897 से वर्ष 2000 तक रही, जो उत्तराखंडवासियों के लिए संघर्ष का समय रहा। आरंभ में यह आंदोलन पुरुषों के माध्यम से संचालित रहा, किंतु बाद में महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आंदोलन को सक्रिय बनाया। जब उत्तराखंड राज्य आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था, तब महिलाएँ भी आंदोलन में पूर्ण रूप से कूद पड़ीं। वे खेत-खलिहानों और चूल्हे-चौके को छोड़कर सड़कों पर उतर आई थीं। धरना प्रदर्शन स्थलों, जुलूसों और रैलियों में उन्होंने पूर्ण रूप से भागीदारी की। महिलाएँ अलग राज्य के लिए आंदोलन की पहली पंक्ति में खड़ी रहीं। खटिमा कांड, रामपुर तिराहा कांड, तिलाड़ी कांड, मसूरी कांड आदि में महिलाओं की शहादत और भागीदारी ने गौरवमय इतिहास रचा। अतः उत्तराखंड राज्य आंदोलन में महिलाओं की विशेष भूमिका रही है। बिना महिलाओं की भूमिका के उत्तराखंड को एक पृथक राज्य का दर्जा मिलना संभव नहीं था। महिलाओं की तत्परता ने आंदोलन को तेज गति प्रदान की थी। प्रस्तुत शोध पत्र में उत्तराखंड आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका, उनके संघर्षों, समर्पण, त्याग और प्राणों की आहुति का उल्लेख किया गया है।
KEYWORDS
उत्तराखंड के सामाजिक आंदोलन या उत्तराखंड पृथक राज्य आंदोलन में महिलाओं की भूमिका उल्लेखनीय है। विशेष रूप से उत्तराखंड पृथक राज्य आंदोलन में महिलाओं ने अपने अदम्य साहस और शक्ति का परिचय दिया। जिसके फलस्वरूप उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ। महिलाएँ पुरुष आंदोलनकारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ती चली गईं। जब तक उत्तराखंड राज्य का गठन नहीं हो गया, तब तक वे निरंतर संघर्ष करती रहीं। सही मायने में उत्तराखंड राज्य प्राप्ति आंदोलन का इतिहास स्थानीय महिलाओं के सतत संघर्ष, त्याग, समर्पण और बलिदान की गाथा है। यह एक सतत संघर्ष की अमिट कहानी है। वे महिलाएँ जिन्होंने राज्य गठन के लिए आंदोलन में नेतृत्व किया, उनमें कौशल्या डबराल, कमला पंत, सुभाषिनी रतवाल, शकुंतला मैठानी, सुशीला बलूनी, उषा नेगी, सुलोचना भट्ट, मनोरमा शर्मा, आशा बहुगुणा तथा विजयलक्ष्मी सहित हजारों-लाखों गढ़वाल और कुमाऊँ की महिलाओं का अतुलनीय योगदान रहा है। उत्तराखंड के इतिहास में सभी महिला आंदोलनकारियों का सदैव सम्मान किया जाएगा और वे नारी सशक्तिकरण का प्रतीक बनकर सदैव याद की जाएंगी।
भंडारी चौहान, डॉ. राजकुमारी, महिला आंदोलनों का इतिहास : पर्वतीय राज्य उत्तराखंड के विशेष संदर्भ में, IOSR Journal of Humanities and Social Science, e-ISSN: 2279-0837, 2019भंडारी, राजकुमारी, उत्तराखंड आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका, प्रकाशित शोध पत्रभट्ट, त्रिलोचन चंद्र, उत्तराखंड आंदोलन, तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली, 2001चमोली, सोनिया, उत्तराखंड में सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलन, Journal of Acharya Narendra Dev Research Institute, ISSN: 0976-3287, 2017प्रसाद, मयंक एवं सिंह, देवेंद्र, उत्तराखंड में महिला प्रतिनिधित्व : संसद तथा विधानसभा के विशेष संदर्भ में, राधाकमल मुकर्जी : चिंतन परंपरा, ISSN 0974-0074, 2022रतवार, शीला, आंदोलन की निरंतरता, उत्तराखंड की महिलाएँ : स्थिति एवं संघर्ष, 2021नेगी, कमल, रतवार, शीला एवं भट्ट, उमा, मुजफ्फरनगर कांड, “मानवीय अस्मिता का सवाल”, उत्तराखंड की महिलाएँ : स्थिति एवं संघर्ष, 2014
Publication Date
5/24/2026
Peer Review Type
Double-Blind Peer Review
Review Rounds: 2
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The authors declare no conflict of interest related to this research work.
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