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Stream/Area:
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Subject:
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Paper ID:
IJSREM65864
Volume:
10 |
7 |
Jul 2026
Pages:
1-13
Publication Frequency:
Monthly (12 issues per year)
License:International Journal of Scientific Research in Engineering and Management follows the Creative Commons Attribution 4.0 (CC BY 4.0) License, allowing free use and distribution with proper attribution.

Political science
Deen Dayal Upadhyay Gorakhpur University Gorakhpur
दक्षिण एशिया की भू-राजनीति हाल के वर्षों में तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रही है, जहाँ भारत-केंद्रित पारंपरिक क्षेत्रीय संरचना को नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इस संदर्भ में नेपाल और चीन के बीच बढ़ता सहयोग विशेष महत्व रखता है। यह अध्ययन नेपाल–चीन संबंधों के उभरते राजनीतिक, आर्थिक, जुड़वों और रणनीतिक आयामों का विश्लेषण करता है तथा उनके भारत पर पड़ने वाले भू-राजनीतिक प्रभावों का मूल्यांकन करता है। शोध जो नव यथार्थवादी, लघु राज्य सिद्धांत और भू-राजनीतिक दृष्टिकोण पर आधारित गुणात्मक एवं विश्लेषणात्मक पद्धति को अपनाता है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि नेपाल का चीन की ओर झुकाव पूर्ण समायोजन (Alignment) न होकर रणनीतिक हेजिंग और स्वायत्तता की खोज का परिणाम है। साथ ही, चीन की बढ़ती उपस्थिति हिमालयी क्षेत्र को एक सक्रिय रणनीतिक स्थान में परिवर्तित कर रही है, जिससे भारत की सामरिक गहराई और क्षेत्रीय भूमिका प्रभावित हो रही है। निष्कर्षतः, इस शोध पत्र के माध्यम से यह प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है कि नेपाल–चीन सहयोग दक्षिण एशिया में शक्ति-संतुलन के संरचनात्मक पुनर्संरचन का संकेत है, जो भारत को अपनी पड़ोसी नीति और क्षेत्रीय रणनीति के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता की ओर इंगित करता है।
KEYWORDS
नेपाल–चीन सहयोग बहुआयामी और संरचनात्मक प्रकृति का है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि नेपाल–चीन संबंध केवल आर्थिक या कूटनीतिक सहयोग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे राजनीतिक, अवसंरचनात्मक, कनेक्टिविटी और सुरक्षा आयामों को समाहित करते हुए एक व्यापक रणनीतिक स्वरूप ग्रहण कर चुके हैं। नेपाल की विदेश नीति में स्पष्ट पुनर्संरेखण देखा जा सकता है। नेपाल पारंपरिक भारत-केंद्रित नीति से आगे बढ़कर बहुविकल्पीय (multi-vector) रणनीति अपना रहा है, जहाँ चीन एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में उभरता है। चीन की उपस्थिति हिमालयी क्षेत्र की भू-राजनीति को पुनर्परिभाषित कर रही है। कनेक्टिविटी परियोजनाएँ और अवसंरचना निवेश हिमालय को निष्क्रिय सीमांत से सक्रिय रणनीतिक स्पेस में परिवर्तित कर रहे हैं। भारत की सामरिक गहराई और पारंपरिक प्रभाव-क्षेत्र पर दबाव बढ़ा है। नेपाल–चीन सहयोग भारत की क्षेत्रीय प्रधानता और सामरिक गणनाओं को चुनौती देता है, जिससे भारत की सुरक्षा दुविधा गहरी होती है। दक्षिण एशिया का शक्ति-संतुलन अधिक प्रतिस्पर्धात्मक और बहुध्रुवीय बन रहा है। भारत अब क्षेत्र में एकमात्र प्रभावशाली शक्ति नहीं रहा, बल्कि चीन की सक्रिय भूमिका क्षेत्रीय संरचना को पुनर्संरचित कर रही है। छोटे राज्य निष्क्रिय नहीं, बल्कि सक्रिय संतुलनकर्ता के रूप में उभर रहे हैं। नेपाल का व्यवहार Small State Theory के अनुरूप है, जहाँ वह बड़ी शक्तियों के बीच संतुलन बनाकर अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करता है। नेपाल–चीन सहयोग शून्य-योग नहीं, बल्कि रणनीतिक हेजिंग का उदाहरण है। यह पूर्ण बैंडवैगनिंग नहीं, बल्कि चयनात्मक और हित-आधारित संलग्नता है, जिससे नेपाल अपने विकल्पों का विस्तार कर रहा है। भारत की पड़ोसी नीति के लिए यह एक चेतावनी संकेत है। अध्ययन से संकेत मिलता है कि प्रभाव-आधारित नीति अब पर्याप्त नहीं है और भारत को अधिक साझेदारी-आधारित, संवेदनशील और समावेशी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। भू-अर्थशास्त्र अब भू-राजनीति का निर्णायक घटक बन चुका है। चीन की आर्थिक कूटनीति और निवेश-रणनीति क्षेत्रीय राजनीति को गहराई से प्रभावित कर रही है, जिससे शक्ति-संतुलन का स्वरूप बदल रहा है। नेपाल–चीन सहयोग दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक संक्रमण का प्रतीक है। यह सहयोग एक व्यापक संरचनात्मक बदलाव का हिस्सा है, जो क्षेत्रीय राजनीति को दीर्घकालिक रूप से पुनर्संरचित कर रहा है।
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Publication Date
7/6/2026
Peer Review Type
Double-Blind Peer Review
Review Rounds: 2
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Conflict of Interest
The authors declare no conflict of interest related to this research work.
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