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ArticlePeer ReviewedOpen AccessPlagiarism Passed
Paper ID:IJSREM64517

समय से परे गांधी: डिजिटल युग में प्रासंगिकता और सोशल मीडिया की सक्रियता

Stream/Area:

-

Subject:

-

Paper ID:

IJSREM64517

Volume:

10 |

6 |

Jun 2026

Pages:

1-13

Publication Frequency:

Monthly (12 issues per year)

DOI
Digital Object Identifier
10.55041/IJSREM64517

License:International Journal of Scientific Research in Engineering and Management follows the Creative Commons Attribution 4.0 (CC BY 4.0) License, allowing free use and distribution with proper attribution.

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Authors

डॉ. ब्रह्मप्रकाश यादव

डॉ. ब्रह्मप्रकाश यादव

राजनीति विज्ञान

राजकीय कन्या महाविद्यालय, मांडल (भीलवाड़ा)

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Abstract

महात्मा गांधी के विचार, मूल्य और संघर्ष की पद्धतियाँ बीसवीं शताब्दी की उपज होते हुए भी इक्कीसवीं शताब्दी के डिजिटल युग में आश्चर्यजनक रूप से प्रासंगिक बनी हुई हैं। यह शोध पत्र इस प्रश्न की पड़ताल करता है कि सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, सर्वोदय और स्वराज जैसे गांधीवादी सिद्धांत आज के सोशल मीडिया, डिजिटल आंदोलनों और ऑनलाइन सक्रियता के संदर्भ में किस प्रकार पुनः व्याख्यायित हो रहे हैं। पिछले एक दशक में अरब वसंत से लेकर #MeToo, Black Lives Matter, फ्राइडे फॉर फ्यूचर, भारत में सीएए-एनआरसी प्रदर्शन, किसान आंदोलन और अनेक स्थानीय जन-अभियानों तक — हर बड़े आंदोलन में सोशल मीडिया एक केंद्रीय मंच बनकर उभरा है। इन आंदोलनों में जहाँ एक ओर अहिंसक प्रतिरोध की गांधीवादी परंपरा की झलक मिलती है, वहीं दूसरी ओर 'ट्रोलिंग', 'हेट स्पीच', फ़र्ज़ी ख़बरें, डिजिटल ध्रुवीकरण और 'कैंसिल कल्चर' जैसी प्रवृत्तियाँ गांधी के मूल विचारों के विपरीत भी खड़ी होती हैं। यह अध्ययन द्वितीयक स्रोतों — गांधी के मूल लेखन, समकालीन शोध, सोशल मीडिया डेटा और हालिया आंदोलनों के विश्लेषण — के आधार पर यह स्पष्ट करने का प्रयास करता है कि डिजिटल युग में गांधीवादी सक्रियता की संभावनाएँ क्या हैं, सीमाएँ क्या हैं, और किस तरह सोशल मीडिया को 'सत्याग्रह 2.0' का माध्यम बनाया जा सकता है। निष्कर्ष यह है कि गांधी का दर्शन आज भी एक नैतिक कम्पास के रूप में काम करता है, जो डिजिटल भीड़ की उग्रता को रचनात्मक, संयमित और सत्य-आधारित विमर्श की ओर मोड़ने की क्षमता रखता है। साथ ही यह अध्ययन रेखांकित करता है कि गांधी की प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए तकनीक, शिक्षा और नागरिक प्रशिक्षण के स्तर पर सचेत प्रयास आवश्यक हैं।

KEYWORDS

महात्मा गांधी डिजिटल युग सोशल मीडिया सक्रियता सत्याग्रह अहिंसा ऑनलाइन आंदोलन

Cite This Article

डॉ. ब्रह्मप्रकाश यादव, "समय से परे गांधी: डिजिटल युग में प्रासंगिकता और सोशल मीडिया की सक्रियता," International Journal of Scientific Research in Engineering and Management, vol. 10, no. 6, pp. 1-13, Jun 2026. https://doi.org/10.55041/IJSREM64517

Full Article/Conclusion

यह शोध पत्र इस मूल प्रश्न से शुरू हुआ था — क्या गांधी का दर्शन डिजिटल युग में प्रासंगिक है? विस्तृत विश्लेषण के बाद उत्तर स्पष्ट है: गांधी न केवल प्रासंगिक हैं, बल्कि कई मायनों में पहले से अधिक आवश्यक हो गए हैं। यह विरोधाभास लग सकता है कि एक व्यक्ति जो स्वयं तकनीक के प्रति संशयी था, चरखे को आधुनिक मशीनों से अधिक महत्वपूर्ण मानता था, और शांत आत्म-चिंतन को राजनीतिक सक्रियता का आधार बताता था — वह आज के तेज़, हिंसक और सतही डिजिटल युग में एक मार्गदर्शक बन सकता है। परंतु यही गांधी की महानता है — उनका दर्शन समय की सीमाओं से परे है। इस अध्ययन के मुख्य निष्कर्षों को तीन बिंदुओं में सारांशित किया जा सकता है। पहला, सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, स्वराज और सर्वोदय — ये पाँच गांधीवादी सिद्धांत डिजिटल युग के पाँच प्रमुख प्रश्नों — फ़र्ज़ी ख़बरें, ऑनलाइन हिंसा, सक्रियता की रणनीति, डेटा संप्रभुता, और डिजिटल समावेशन — के उत्तर खोजने में सहायक हैं। दूसरा, हाल के आंदोलनों — विशेष रूप से किसान आंदोलन और फ्राइडे फॉर फ्यूचर — ने यह सिद्ध किया है कि गांधीवादी रणनीतियाँ डिजिटल माध्यम के साथ संयोजन में और अधिक प्रभावी हो सकती हैं। तीसरा, डिजिटल युग की कई समस्याएँ — ट्रोलिंग, घृणा-प्रसार, स्लैक्टिविज़्म — गांधीवादी मूल्यों के विरुद्ध हैं, और इन्हें दूर करने के लिए एक नया 'डिजिटल सत्याग्रह' विकसित करना आवश्यक है। व्यावहारिक दृष्टि से कुछ सिफ़ारिशें भी की जा सकती हैं। पहला, स्कूल और कॉलेज स्तर पर 'गांधीवादी डिजिटल नैतिकता' का पाठ्यक्रम शामिल किया जाना चाहिए, जो छात्रों को न केवल तकनीकी कौशल बल्कि नैतिक उपयोग की समझ भी दे। दूसरा, मीडिया साक्षरता और तथ्य-जाँच के अभियानों को व्यापक स्तर पर चलाया जाना चाहिए, जिसमें गांधीवादी सत्याग्रह की भावना केंद्रीय हो। तीसरा, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों को अपनी एल्गोरिथम-नीति में बदलाव करना चाहिए ताकि भड़काऊ सामग्री की तुलना में संयमित और रचनात्मक विमर्श को बढ़ावा मिले। चौथा, नागरिक समाज और सरकार दोनों को मिलकर 'डिजिटल स्वराज' की दिशा में काम करना चाहिए — चाहे वह डेटा संरक्षण क़ानूनों के माध्यम से हो या स्वदेशी डिजिटल बुनियादी ढाँचे के विकास के माध्यम से। अंत में, यह कहना उचित होगा कि गांधी का दर्शन एक स्थिर सिद्धांत-संग्रह नहीं है, बल्कि एक जीवंत, गतिशील नैतिक परंपरा है। हर युग अपने प्रश्न उसके सामने रखता है, और हर बार यह दर्शन नए उत्तर देने में सक्षम सिद्ध होता है। डिजिटल युग की चुनौतियाँ अभूतपूर्व हैं, परंतु उन्हें संबोधित करने के लिए गांधी जिन उपकरणों की ओर इशारा करते थे — सत्य, अहिंसा, संयम, आत्म-अनुशासन, और सर्वकल्याण — आज भी प्रासंगिक हैं। गांधी 'समय से परे' इसलिए हैं क्योंकि उनके मूल्य मानवीय गरिमा, नैतिक उत्तरदायित्व और सामूहिक कल्याण पर आधारित हैं — और ये मूल्य किसी भी युग में, किसी भी तकनीक में अप्रचलित नहीं हो सकते।

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