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Subject:
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Paper ID:
IJSREM62420
Volume:
10 |
5 |
May 2026
Pages:
1-6
Publication Frequency:
Monthly (12 issues per year)
License:International Journal of Scientific Research in Engineering and Management follows the Creative Commons Attribution 4.0 (CC BY 4.0) License, allowing free use and distribution with proper attribution.
शोधार्थी
बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालधनबाद, धनबाद।
बाजारवाद व पूँजीवाद पूरे समाज में व्याप्त हो रहा था और स्त्री समाज इसके प्रभाव से कैसे बच सकती थी। स्त्री के विचार आसमान छूने की थी तो पाँव धरती नापने की, वह शांत कैसे बैठ सकती थी तथापि इस बाजारवाद के वैश्विक रूप में वह भी अपने आप को समा लेना चाहती है। अतः इस लेख में मृदुला गर्ग के विचार से समाज की प्रगति और उद्धार में नारी के बहुमूल्य योगदान को निर्विवाद रूप में स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। उनकी नारियाँ वैश्विक परिप्रेक्ष्य में किस प्रकार अपने को समेटने और विकसित करने का प्रयास कर रही है उसका वर्णन इस लेख में विस्तारपूर्वक किया गया है।
KEYWORDS
समकालीन भारतीय समाज, विशेषकर शहरी मध्यम वर्ग की जटिलताओं, बदलती पारिवारिक संरचनाओं और स्त्री-पुरुष संबंधों में आए बदलावों का यथार्थवादी और बहुआयामी चित्रण करते हैं, जहाँ आधुनिकता के साथ आए नए संकट, उपभोक्तावाद और यौनिकता के मुद्दों को बिना किसी अपराधबोध के चित्रित किया गया है, जो स्त्री-विमर्श और सामाजिक न्याय के सवालों को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक बनाता है। मृदुला गर्ग के उपन्यास चित्तकोबरा, मिलजुल मन, कठगुलाब, उसके हिस्से की धूप, मैं और मैं में वैवाहिक संबंध और स्त्री पुरुष के बीच की मानवीय संबंधों में बाजारवाद, व भूमंडलीकरण का प्रभाव विशेष कर देखने को मिलता है। उनकी स्त्री का प्रमुख सरोकार रहा है अपने पक्ष में खुद लड़ना और खुद खड़े होना जब तक यह लड़ाई अपनी ओर से वह नहीं लड़ती उनकी स्त्री संतुष्ट नहीं होती। उनके उपन्यास कठगुलाब में “स्त्री जाति पनपती वेदना को मनोविश्लेषणात्मक चिंतन के साथ प्रस्तुत किया गया है। इस उपन्यास में स्मिता, मारियान, नर्मदा, असीमा, पत्रों के माध्यम से बौद्धिक, चिंतनशील, शिक्षित, आर्थिक, स्वावलंबी तथ्यों को उभारा गया है। उन्होंने स्त्री पात्रों के माध्यम से पुरानी परंपराओं को तोड़कर नये युग की नई परंपराओं, परिकल्पनाओं का चित्रण किया है। भारतीय परंपरागत मान्यताओं को तोड़कर पाश्चात्य सभ्यता के आलोक में स्त्री में आए बदलाव को रेखांकित किया है।”5
1. शर्मा, डॉ. विजय लक्ष्मी, मिश्रा, डॉ. सुकृति, स्त्री चिंतन की विविध आयाम, भारतीय प्रकाशन वाराणसी 10 प्रथम संस्करण 2015,पृष्ठ-100 2. पी.आर.वासुदेवन, आधुनिक हिंदी उपन्यासों में चित्रित नारी, पृष्ठ-62 3. वहीं, पृष्ठ-62-63 4. AI अवलोकन, विकीपीडिया, शुक्रवार 26/12/2025 5. डॉ.स्नेहलता, समकालीन हिंदी उपन्यासों में स्त्री विमर्श, पृष्ठ सं-169
Publication Date
5/2/2026
Peer Review Type
Double-Blind Peer Review
Review Rounds: 2
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Conflict of Interest
The authors declare no conflict of interest related to this research work.
Funding Information
No funding information available for this research.
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